अधूरा ख्वाब
- Lalit Gaur
- Apr 30, 2022
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नवंबर का समय था, सर्द ऋतु अपने चरम पर थी। घर के दरवाज़े के पास रघुनाथ के पिता ने कुछ लकड़ियां और कागज़ जला रखे थे, उसकी पत्नी सीमा अपनी बेटी को सुलाने की कोशिश कर रही थी। सीमा बहुत ही कमज़ोर हो चुकी थी, शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी। पिछली सर्दी में कुछ इसी समय उसने अपने बेटे को खो दिया था। पैसे के आभाव में उसका इलाज ना करा पाए। रघुनाथ के पिता भी कुछ खोये खोये से रहते थे। अपने घर के हालत, अपने पोते की वो पहली हंसी, अपनी बहु का बीमार होने के बावजूद दिन रात घर का काम करना, इस सब के बारे में सोच कर उनकी आँखे भर आती थीं। जैसे एक गरीब भिकारी राह चलते व्यक्ति की तरफ देखता है और कुछ पैसो की मदद मांगता है, ठीक उसी प्रकार रघुनाथ के पिता भी उन लपटों की तरफ देख प्रभु से विनती कर रहे थे कि उनका भी अग्नि देवता से मिलन करा दें। उन्हें इस समय रघुनाथ की माँ की भी कमी खल रही थी।
सभी को इनकी आर्थिक स्थिति के बारे में मालूम था। कुछ लोग इन्हे नीची नज़र से देखते, और कुछ दया की, पर कोई कभी इनकी मदद करने के बारे में न सोचता। दूसरों का दर्द देखने का समय कहाँ है लोगों के पास। लेकिन किसी ने कभी रघुनाथ के चेहरे पर एक शिकन भी नहीं देखी। गोरा, लम्बाई भी ज्यादा नहीं, छरहरा सा, मुश्किल से अठारह उन्नीस साल का लड़का लगता था। उसके चेहरे पे हमेशा एक मंद सी मुस्कान रहती। खुदा जाने किस बात की ख़ुशी झलकती थी उसके चेहरे पे। आजकल एक ठेकेदार के यहाँ मजदूरी कर रहा है। रोज़ ढाई सौ रुपये मिल जाते हैं और जब तक उन्हें गिनता है तब तक तो खर्च भी हो जाते हैं।
उस रात भी पतली सी फटी हुई चादर ओढ़े पड़ा था अपनी खाट पर। ठिठुर रहा था, पर क्या करे। एक बार को मन में आया कि चाय बना लूँ, पर फिर सोचा कि सुबह पिताजी कि चाय और गुड़िया के लिए दूध में कमी हो जाएगी। चार पैसे कहाँ बचा लूँ बस इसी उधेड़ बुन में लगा रहता। कुछ आठ सौ-हज़ार रुपये जोड़ रखे थे, अगले दिन दिवाली थी। रात भर बस यही सोच रहा था कि कुछ मिठाई ले आऊंगा, सीमा के लिए कुछ चूड़ियां ले आऊंगा, गुड़िया के लिए पटाखे और घर के लिए कुछ दिए ले आऊंगा।
पर सबसे तीव्र गति से जो बात उसके दिमाग में घूम रही थी, वो थी, पिताजी की जूती। चार-पांच साल हो गए पिताजी ने नयी जूती नहीं पहनी। उन्हीं में कई बार टाँके लगवा चुके थे। थोड़ा ज्यादा चल लेते तो पैरों में छाले पड़ जाते। कभी रंग के बारे में सोचता कभी पिताजी के पैर का नाप याद करने की कोशिश करता। पिछली बार जब उनके लिए जूतियां लाया था तब उनकी आँखों में जो ख़ुशी देखी थी, कभी उसकी बारे में सोचता और अपनी फटी हुई चादर में थोड़ा और सिकुड़ जाता। जैसे जैसे रात बढ़ रही थी वैसे वैसे सर्दी भी बढ़ती जा रही थी। अपनी टूटी हुई टीन में से आसमान के तरफ देखते हुए सोच रहा था कि सुबह सबके उठने से पहले ही जूतियां ले आऊंगा। जितने उस काली रात में तारे थे उतने ही रघुनाथ के मन में ख्याल चल रहे थे।
सुबह लगभग साढ़े छह बजे उठ कर जूतियां लेने निकल गया, घर में किसी को बिना बताये। कुछ पांच सात किलोमीटर दूर ही उसके एक दोस्त का घर था जो जूतों कि फैक्ट्री में काम करता था। उससे कह कर तीन सौ रुपये की सुन्दर सी जूती मंगाई थी। उन जूतियों को लेकर वो घर की तरफ निकल पड़ता है। रस्ते भर यही सोच रहा था कि ये जूतियां पिताजी को पसंद भी आयंगी, वे कितने खुश हो जायेंगे। मन में प्रसन्नता का भाव लिए और ह्रदय में पिताजी के मुख पर हंसी देखने की आस लिए रघुनाथ चल रहा था।
जब घर के ज़रा नज़दीक पहुंचा तो देखता है घर के पास सात आठ लोग खड़े थे, एक शांत और सर्द सा भाव अपने चेहरे पर लिए। अंदर जाता है तो देखता है, गुड़िया कुछ खेल रही थी, सीमा अंदर के कमरे में थी और तीन चार लोग उसके पिता को घेरे खड़े थे। शायद भगवान ने उसके पिता की विनती सुन ली। कुछ लोग रघुनाथ के पास आके खड़े हो गए और उसे सांत्वना देने लगे। उसने जूतियों को अपने सीने से लगा रखा था, आँखे भारी हो चलीं थीं और हमेशा कि तरह उसके चेहरे पर एक मंद सी मुस्कान थी।




Iss lekh ne to phir se Malgudi Days ki yaad dila di... Asha karte ha yese sundar lekh aage bhi milte rahenge.
Aisa laga mere samne sab ghat raha hai. Bahut shandar.
मर्मस्पर्शी। विपरीत परिस्थितियों में जीवन जी रहे मानवीय संबंधों का अत्यंत जीवंत चित्रण।
ऐसे ही लेखन को आगे भी पढने को आतुर।