top of page
Search

बोझल आँखें

  • Writer: Lalit Gaur
    Lalit Gaur
  • Sep 6, 2022
  • 3 min read


एक वक़्त था, जब कड़ी धूप में भी न जाने क्या क्या और कैसे कैसे ख्वाब देख लेतीं थी आँखें। मैच का आखिरी ओवर है, सामने शोएब अख्तर, और क्रीज़ पे खड़ा हूँ मैं। सोलह रनों की ज़रूरत है। एक हाथ से मैं अपना पसीना पोंछता हूँ और फिर सरसरी नज़रों से पूरे मैदान को देखता हूँ। और फिर बॉल दर बॉल दर्शकों का रोमांच बढ़ाते हुए, आखिरी गेंद पर बॉल को सीमा रेखा के पार भेज देता हूँ।


बड़े चाव से एक एक फ्रेम का विवरण करती थीं आँखें। ये नहीं की मैं आया और फतह हासिल कर ली, कतई नहीं। एक ठहराव, एक तसल्ली से पूरा ख्वाब दिखाती थीं। बगल से कोई गुज़रता हुआ व्यक्ति अगर मुझे देख ले तो पक्का मूर्ख ही समझे। सोचे कि, धूप में बेंच पे बैठ के न जाने क्यों मुस्कुरा रह है ये गधा। उससे क्या पता, अभी अभी मैंने देश को मैच जिताया है। उस वक़्त आँखों को इस बात से ज़रा भी फरक नहीं पड़ता था, कि मुझे ठीक से बल्ला पकड़ना भी नहीं आता। मुझपे कितनी ही बंदिशें हों, ख्वाब उन सब से परे थे।


एक और ख्वाब कई बार दिखाती थीं। कि बरसों पुराने किसी गणित की पहेली को, जिसे बड़े बड़े विद्वान भेद नहीं पाए, मैंने सॉल्व कर दिया है। एक बार तो बोलीं कि तुम्हारे नाम पर कोई थ्योरम हो तो कैसा रहेगा , " गौर थ्योरम " , सुन के ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। आजकल न जाने क्या हो गया है इन्हें। बिलकुल नीरस और थके हुए आदमी जैसे ख्वाब दिखातीं हैं। बिलकुल मज़ा नहीं आता। कभी कहती हैं कि एक गाडी ले लेते हैं , तो कभी कहती हैं, कि सोचो, तुम आज से दुगना कमाने लगे तो कैसा होगा। हट , ये भी कोई ख्वाब हैं। या शायद मेरे ख़्वाबों का बोझ उठाते उठाते थोड़ी थक सी गयीं हैं। या इन्होने भी मेरी तरह थोड़ी दुनिया देख ली है। जी सा नहीं लगता अब।


सोच रहा हूँ , एक दिन इन्हें बिठा कर अच्छे से समझाऊँ। ये शायद भूल चुकीं हैं कि ये आज़ाद हैं। जो चाहे कर सकती हैं। जैसा चाहे वैसा ख्वाब देख सकती हैं। आँखें कब से ज़हनी बंधनो में बंधने लगीं । इन्हें ज़रा सी थकान क्या हुई , मेरे बारे में सोचना छोड़ ही दिया। ये अगर ख्वाब न देखें तो मेरा क्या होगा, वजूद क्या है फिर मेरा। फिर मुझमे और एक मुर्दा शरीर में क्या अंतर। थोड़ा आराम कर लो भाई, पर मुझे वही पहले वाले ख्वाब देदो ।


या शायद मेरी ही गलती है । या फिर शायद ये सोच रहीं है मेरे बारे में। शायद कुछ कहना चाह रही हैं । एक आइना दिखाना चाह रहीं हैं शायद। शायद मैं ही खुद को पहले से कमतर आंकने लगा हूँ । पहले मैं पीतल छू कर सोना कर सकता था, अब शायद पीतल को ही मुकद्दर मान रहा हूँ। अगर ऐसा है तो ये सरासर गलत है। बहुत छोटी और ओछी बात है । ऐसी नासमझी कि उम्मीद न थी मुझे खुद से । इन ज़हनी बंदिशों से लगता है मुझे दूर जाना होगा, बहुत दूर। फिर शायद आँखें भी नए ख्वाब देख पाएं । फिर शायद मेरा जी लगने लगे, फिर से। सोच रहा हूँ बादलों में थोड़ा उड़ के आऊं इस बार।


तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

-अल्लामा इक़बाल

 
 
 

1 Comment


Ravi Kant Gaur
Ravi Kant Gaur
Sep 06, 2022

बेहतरीन चित्रण, सोचना नहीं है बस उड़ान पर निकल पड़ना है।


Like
Post: Blog2_Post

Subscribe Form

Thanks for submitting!

Live and let live. Lalit Gaur. ©2022

bottom of page